New Delhi : दक्षिण भारत के राज्य Kerala के आधिकारिक नाम को बदलकर ‘केरलम’ किए जाने के प्रस्ताव ने सियासी बहस को तेज कर दिया है। राज्य सरकार की ओर से केंद्र को भेजे गए इस प्रस्ताव के बाद राजनीतिक दलों के बीच बयानबाज़ी शुरू हो गई है। इसी मुद्दे पर कांग्रेस सांसद Shashi Tharoor ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि अगर राज्य का नाम ‘केरलम’ हो जाता है, तो वहां के लोगों को क्या कहा जाएगा—‘केरलमियन’ या कुछ और?
दरअसल, राज्य सरकार लंबे समय से यह मांग कर रही थी कि अंग्रेज़ी में प्रचलित ‘Kerala’ की जगह ‘Keralam’ नाम को आधिकारिक मान्यता दी जाए। सरकार का तर्क है कि ‘केरलम’ शब्द राज्य की मूल भाषा मलयालम और सांस्कृतिक पहचान के अधिक अनुरूप है। विधानसभा में इस संबंध में प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को भेजा गया था। यह भी पढ़ें :झारखंड कैबिनेट की बड़ी बैठक: 22 प्रस्तावों को मंजूरी, नेतरहाट स्कूल में नियुक्तियां अब JPSC या JSSC से
हालांकि, इस मुद्दे पर विपक्षी दलों और कुछ राजनीतिक नेताओं ने सवाल उठाए हैं। शशि थरूर ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि नाम बदलना प्रतीकात्मक कदम हो सकता है, लेकिन इससे कई व्यावहारिक और भाषाई प्रश्न भी खड़े होते हैं। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में पूछा कि यदि नाम ‘केरलम’ हो जाएगा, तो वहां के नागरिकों को ‘केरलमियन’ कहा जाएगा या फिर कोई नया शब्द गढ़ा जाएगा?
थरूर का यह बयान तेजी से चर्चा में आ गया। समर्थकों का कहना है कि उनका सवाल भाषाई और प्रशासनिक जटिलताओं की ओर इशारा करता है, जबकि आलोचकों का आरोप है कि वे एक सांस्कृतिक पहल को अनावश्यक रूप से विवादित बना रहे हैं।
राज्य सरकार का पक्ष स्पष्ट है। उनका कहना है कि ‘केरलम’ नाम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से अधिक प्रामाणिक है। मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ ही कहा जाता है, इसलिए अंग्रेज़ी में भी उसी नाम को मान्यता देने की मांग की गई है। सरकार का दावा है कि इससे राज्य की पहचान और सांस्कृतिक अस्मिता को मजबूती मिलेगी।
नाम बदलने के मुद्दे पर देश में पहले भी कई उदाहरण देखे जा चुके हैं। शहरों और राज्यों के नाम स्थानीय भाषाओं और ऐतिहासिक पहचान के अनुरूप बदले गए हैं। ऐसे में ‘केरलम’ प्रस्ताव को भी उसी कड़ी में देखा जा रहा है। हालांकि, किसी भी आधिकारिक नाम परिवर्तन के लिए केंद्र सरकार की मंजूरी आवश्यक होती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नाम परिवर्तन का मुद्दा भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव से जुड़ा होता है, इसलिए इस पर प्रतिक्रियाएं भी तीखी होती हैं। जहां एक ओर समर्थक इसे सांस्कृतिक पुनर्स्थापन का कदम मानते हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ लोग इसे प्रतीकात्मक राजनीति बताते हैं।
इस पूरे विवाद के बीच आम जनता की राय भी बंटी हुई है। कुछ लोगों का कहना है कि नाम बदलने से राज्य की पहचान को मजबूती मिलेगी, जबकि अन्य का मानना है कि इससे प्रशासनिक दस्तावेज़ों, ब्रांडिंग और अंतरराष्ट्रीय पहचान पर असर पड़ सकता है।
फिलहाल, यह प्रस्ताव केंद्र सरकार के विचाराधीन है। अंतिम निर्णय आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि राज्य का आधिकारिक अंग्रेज़ी नाम ‘Kerala’ ही रहेगा या ‘Keralam’ हो जाएगा। लेकिन इतना तय है कि इस मुद्दे ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है और आने वाले दिनों में इस पर चर्चा जारी रहने की संभावना है।
